खज्जियार: भारत का अपना मिनी स्विट्जरलैंड, जहाँ मैं सच में अपना दिल हार बैठा! (पूरा गाइड और मेरा पर्सनल एक्सपीरियंस)
यार, खज्जियार पहुँचने से पहले मैंने इसके बारे में सिर्फ एक ही चीज़ सुनी थी — "भारत का मिनी स्विट्जरलैंड"। सच बताऊँ? नाम सुनकर मुझे थोड़ा डाउट ही हुआ था। आजकल हर दूसरी पहाड़ी जगह को लोग स्विट्जरलैंड कह देते हैं, तो मेरी उम्मीदें थोड़ी कम ही थीं।
लेकिन भाई, जब हमारी गाड़ी डलहौज़ी से खज्जियार की तरफ मुड़ी और अचानक सामने वो गोल तश्तरी जैसा, हरा-भरा घास का मैदान खुला... मैं बस देखता रह गया। चारों तरफ लंबे-लंबे देवदार के पेड़, बीच में एक प्यारी सी झील, और सबसे कमाल की बात— उस घास के मैदान के बीच से एक पक्की सड़क गुज़र रही थी! एक पल के लिए मन किया कि गाड़ी यहीं रोकूँ और नंगे पैर उस घास पर दौड़ लगा दूँ।
अगर तुम भी यहाँ जाने का प्लान कर रहे हो, तो मैं अपना पूरा एक्सपीरियंस यहाँ शेयर कर रहा हूँ, ताकि तुम्हारी ट्रिप एकदम मक्खन जैसी जाए।
वो खूबसूरत रास्ता (डलहौज़ी से खज्जियार)
डलहौज़ी से खज्जियार की दूरी मुश्किल से 22-24 किलोमीटर है। लेकिन ये एक घंटे का रास्ता इतना ज़बरदस्त है कि तुम कैमरा अंदर नहीं रख पाओगे। रास्ते में 'कलाटॉप वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी' के घने जंगल पड़ते हैं। अगर तुम बस या शेयर टैक्सी से जा रहे हो, तो शायद थोड़ा ज़्यादा टाइम लग जाए, पर नज़ारे तुम्हें बोर नहीं होने देंगे।
खज्जियार समुद्र तल से लगभग 2,000 मीटर की ऊँचाई पर है। यहाँ की सबसे खास बात जो मुझे लगी वो ये कि आपको कोई ट्रेकिंग नहीं करनी। आप गाड़ी से आते हो, उतरते हो और सीधे उस मखमली घास पर कदम रखते हो। ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने तुम्हारे स्वागत के लिए खुद दरवाज़ा खोल दिया हो।
खज्जियार कैसे पहुँचें? (सबसे आसान तरीका)
दोस्तों, खज्जियार जाने का सबसे सीधा जुगाड़ है कि पहले डलहौज़ी पहुँचो।
सड़क से: दिल्ली से डलहौज़ी करीब 550 किलोमीटर है। अगर रात की बस पकड़ते हो (दिल्ली या चंडीगढ़ से), तो 11-12 घंटे में सुबह-सुबह डलहौज़ी पहुँच जाओगे। वहाँ बस स्टैंड से खज्जियार के लिए लोकल बसें और शेयर टैक्सियाँ आराम से मिल जाती हैं।
ट्रेन से: सबसे नज़दीकी बड़ा रेलवे स्टेशन पठानकोट है (यहाँ से डलहौज़ी 80 किमी दूर है)। पठानकोट उतरो, बाहर से डलहौज़ी की बस या टैक्सी लो, और फिर वहाँ से खज्जियार।
फ्लाइट से: कांगड़ा का गग्गल एयरपोर्ट यहाँ से 120 किलोमीटर दूर है। पर सच कहूँ यार, असली मज़ा तो रोड ट्रिप में ही है!
जाने का बेस्ट टाइम क्या है?
मैंने अप्रैल में जाने का फैसला किया था और मेरा यकीन मानो, वो फैसला एकदम सही था।
अप्रैल से जून / सितंबर से नवंबर: यह सबसे बेस्ट टाइम है। मौसम एकदम साफ, घास हरी-भरी, और ठंडी-ठंडी हवा! सारे एडवेंचर स्पोर्ट्स भी इस समय चालू रहते हैं।
जुलाई से सितंबर (मानसून): हरियाली डबल हो जाती है, पर भाई, पहाड़ हैं... सड़कें थोड़ी फिसलने वाली हो सकती हैं। थोड़ा रिस्क रहता है।
दिसंबर से फरवरी (सर्दियाँ): अगर तुम्हें बर्फ देखनी है, तो सर्दियों में जाओ। पूरा मैदान सफेद हो जाता है। पर हाँ, ठंड हड्डियाँ कंपाने वाली होती है और कई बार सड़कें बंद भी हो जाती हैं।
खज्जियार में क्या-क्या करें? (मेरा पर्सनल रूटीन)
घास पर टहलना: सुनने में नॉर्मल लग रहा होगा, पर सुबह 7 बजे जब पूरा मैदान खाली था, तब मैं वहां टहल रहा था। यहाँ की मिट्टी में उगने वाली घास एकदम स्पंज जैसी होती है, पैर अंदर धँसते हैं। वो शांति... भाई, शब्दों में नहीं बता सकता।
खज्जी नाग मंदिर: झील के बिल्कुल किनारे 12वीं सदी का यह मंदिर है। लकड़ी की नक्काशी इतनी गज़ब है कि देखते रह जाओगे। अंदर बैठकर जो सुकून मिलता है, वो कमाल का है।
एडवेंचर का डोज़: अगर तुम्हें थोड़ा रोमांच चाहिए, तो पैराग्लाइडिंग ज़रूर करना (सीजन: सिंतबर-नवंबर और जनवरी-जून)। आसमान से खज्जियार का नज़ारा देखना एक अलग ही फील है। इसके अलावा बच्चे और जवान यहाँ 'ज़ोर्बिंग' (उस बड़ी सी ट्रांसपेरेंट बॉल में लुढ़कना) और हॉर्स राइडिंग भी बहुत एन्जॉय करते हैं।
खाने-पीने का क्या सीन है?
खज्जियार मैदान के पास कोई फैंसी रेस्टोरेंट नहीं हैं, पर छोटे-छोटे प्यारे ढाबे हैं। मैंने वहाँ एक ढाबे पर 'सिड्डू' ट्राई किया था (यह भाप में पकी एक स्टफ्ड रोटी होती है)। बाहर ठंडी हवा चल रही थी और हाथ में गरम अदरक वाली चाय और सिड्डू... आहा! इसके अलावा तुम यहाँ का लोकल 'मद्रा' (दही और चने की डिश) भी ट्राई कर सकते हो।
रुकने की जगह और बजट (होटल डिटेल्स)
अगर तुम डलहौज़ी से आ रहे हो, तो खज्जियार में रुकने के बहुत ऑप्शंस हैं:
बजट वालों के लिए: 'स्नो व्यू होमस्टे' या 'रॉयल रेज़िडेंसी' जैसी जगहें हैं जहाँ कमरा 800 रुपये से शुरू हो जाता है।
थोड़ा लग्ज़री चाहिए: 'आनंथम कंट्री रिज़ॉर्ट' (करीब ₹3,200/रात) या फिर ITC ग्रुप का 'फॉर्च्यून खज्जियार' (करीब ₹6,400/रात) बहुत बढ़िया हैं। फॉर्च्यून तो मंदिर और झील से बस 5 मिनट की वॉक पर है।
मेरा एक्सपीरियंस: मैं एक छोटे से होमस्टे में रुका था। सुविधाएँ लिमिटेड थीं, पर सुबह खिड़की खोलते ही जो धुंध में लिपटे पहाड़ों का नज़ारा दिखा, वो किसी 5-स्टार में भी नहीं मिलता।
जेब पर कितना असर पड़ेगा? (कुल खर्चा)
अगर तुम 2 दिन का बजट ट्रिप प्लान कर रहे हो (बस और शेयर टैक्सी से), तो दिल्ली से आने-जाने, रुकने और खाने का खर्चा करीब ₹4,000 से ₹5,000 प्रति व्यक्ति आएगा। पैराग्लाइडिंग या ज़ोर्बिंग (₹500-₹1500) का खर्चा इसमें अलग से जोड़ लेना।
मेरी तरफ से एक छोटी सी सलाह!
बहुत से लोग खज्जियार को डलहौज़ी से सिर्फ 'हाफ-डे ट्रिप' समझकर आते हैं। आते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और चले जाते हैं। भाई, ये गलती मत करना। यहाँ कम से कम एक रात ज़रूर रुकना। सुबह की वो शांति और धुंध तुम्हें असली 'मिनी स्विट्जरलैंड' का एहसास कराएगी। खज्जियार वो जगह है जहाँ आपको कुछ 'करना' नहीं है, बस बैठना है और उस पल को जीना है।